Friday, August 22, 2008

समझ हर पहलू की दर्द ही देती है शायद
ईसने तो दीवारें ही बनायी
मेरी समझ का रोज एक दीवार बनाना
और तुम्हारी का उसे तोड़ने से मना करना
नुक़सान तो हमारा ही हुआ
हमारे बीच सिर्फ़ दीवारे बनी टूटी नहीं
आज सोच कर परेशां हूँ
बचपन की उस सुबह
जब तुम्हारे हाथ को पकड़
नीम के साये तले
क्यों कहाँ था मैंने?
भगवान् हमें बड़ा कर दो
उसने तो बड़ा बना दिया बड़प्पन छीन कर
समझ दे दी मासूमियत छीन कर
और अब हम दीवारें बना रहे है
बचपन में होता तो शायद यही पूछता
तुम ठीक तो हो उस पार???
अब तो डर लगता है मांगते ये भी
की छीन लो ये समझ
न जाने क्या हो अंजाम?

3 comments:

Me said...

Rahul,
All I can say after reading this post is that you have an amazing style of portrying emotions with words...
I really really loved each and every bit of it as it speaks a volume...
Each one of us feels at some point in our life that what if we wud not have grown up at all and the innocence was still intact...

Applauds!
Harshita

Sneha Shrivastava said...
This comment has been removed by the author.
Sneha Shrivastava said...

Very poignant.
Tooooooooo Goooooooood.:)